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चंद्रपुर,(वि. प्र.)- श्रीराम कथा का पंचम सत्र में धनुष्य भंग प्रसंग पर प्रसिद्ध कथाकार राजन महाराज ने व्यासपीठ से कहा कि दोनों भाइयों राम लक्ष्मण द्वारा यज्ञ भंग करने वालों ताड़का सहित सभी राक्षसों को मार दिया गया और मारीचि को 100 योजन दूर फेकने के बाद विश्वामित्र जी का यज्ञ पूरा करवाये।
यज्ञ पूरा होने पर प्रफुल्लित विश्वामित्र ने कहा कि राम आप आये तो मेरा यज्ञ पूरा हो गया। दूसरा यज्ञ मिथिला में हो रहा है। आप चलेंगे तो राजा जनक जी का भी यज्ञ पूरा हो जाएगा। श्री राम सहज तैयार हो गए और मिथिला के लिए रवाना हो गए। रास्ते में पति गौतम ऋषि द्वारा शाप के कारण पत्थर बनी माँ अहिल्या को श्रीराम ने चरण रज स्पर्श कर उद्धार किया। उन्हें गति दिया।
साथ में श्रेष्ठ हो तो आगे बढ़ने की बजाय उनकी आज्ञा की प्रतीक्षा करना चाहिए। कोई श्रेष्ठ कुछ कहें तो ऐसे सुनना चाहिए जैसे कि वह प्रसंग पहली बार सुन रहे हैं। महाराज ने कहा कि आप के बारे में कोई अच्छा सोच रहा है तो आप भाग्यशाली है।
गुरुजी और दोनों बालकों चलते हुए जब जनकपुर पहुंचने के हुए तो वहां के आम के बगीचे में रुक गए। जानकारी मिलने पर जनक जी अपने मंत्री मंडल सहित बगीचे की तरफ दौड़ पड़ें। राजा जनक ने विश्वामित्र जी का स्वागत करने के पश्चात दोनों बालकों का परिचय जाना।
दशरथ राजकुमार नजर तोहे लग जाएगी। श्यामल गौर कुमार नजर तोहे लग जाएगी। भजन पर श्रद्धालुओं खूब झूमें।
श्रीराम को देखकर सहेलिया आपस में चर्चा करती है कि हमारी सहेली सीता के लिए सबसे अच्छा वर यही सावला वाला बालक होंगे। दूसरी सहेलिया संशय करती है कि धनुष्य तोड़ पाएंगे क्या?
राम लक्ष्मण पहुंचे फुलवाड़ी
बिना अनुमति मांगे किसी का फल-फूल नहीं तोड़ना चाहिए। इसलिए राम लक्ष्मण दोनों ने माली से अनुमति मांगकर फूल तोड़ने लगे। इसी दौरान सीता जी अपनी आठ सखियों के साथ फुलवारी में स्थित माँ भवानी के मंदिर में पूजा करने आई। उनमें से एक सखिया ने पुष्प तोड़ते हुए राम को देख लिया तो गुनगुनाने लगी। जिनकी चर्चा है कल से नगरिया में, वही आये सखी फुलवरिया में।
किसी का कमी देखने की बजाय प्रसंशा करना सीखिए। अच्छा देखेगे तो अच्छा होगा। कोई सेवा दे रहा है तो उससे उतने ही सेवा ली जाए ताकि हर बार सेवा देने की उसकी इच्छा बनी रहे।
दस हजार राजाओं मिलकर भी स्वयंवर के लिए रखा शंकर जी का धनुष को हिला नहीं पाएं। यह दृश्य देखकर जनक जी गुस्से में बोल उठें। धरती वीरों से खाली है। आज से कोई नहीं बोलेगा की मैं वीर हूँ। राजा जनक द्वारा कहा गया उक्त वाक्य दशरथ नंदन लक्ष्मण को नागवार गुजरा। वे गुस्से से लाल हो गए। राम भैया के समझाने पर लक्ष्मण शांत हुए जबकि विश्वामित्र के आज्ञा पाकर श्रीराम ने स्वयंवर के लिए रखा शिवधनुष को उठाकर ऐसे तोड़ दिया मानो किसी अत्यंत कठोर वस्तु को गेंद की तरह उठाकर पटक दिया हो।
श्रीराम कथा का उधेश्य है कि सकल समाज एक हो। इसलिए हर दिन अलग -अलग समाज के लोंगों से राजन महाराज से भेंट करवाई जाती और स्वागत कराया जाता है। इसके मद्देनजर हर दिन कथा के विश्राम पश्चात सर्व समाज के लोंगो से आरती करवाई जाती है। हिन्दू समाज में भेद-भाव कभी रहा ही नहीं। भगवान श्रीराम केवट समाज राजा निषाद को दोस्त बनाया। भिलनी शबरी के कुटिया में जाकर बेर खाया। सुग्रीव से दोस्ती की। जटायु को पितातुल्य माना। श्री हनुमान उनके सबसे परम भक्त बनें। ऐसे दर्जनों प्रसंग है। यह तो बीच के कुछ शताब्दियों में आताताइयों ने देश पर राज करने के उद्देश्य से आपस में फुट डालने के लिए भेद भाव पैदा करवाया।
जिलाधिकारी विनय गौड़, मनपा आयुक्त अकूनूरी नरेश, भाजपा जिलाध्यक्ष हरीश शर्मा सहित दर्जनों गणमान्यों चांदा क्लब ग्राउंड स्थित श्रीराम कथा स्थल को भेंट दी। कार्यक्रम के विश्राम पश्चात भव्य महाप्रसाद वितरण हुआ।

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