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चंद्रपूर,(वि. प्र.) – श्रीराम कथा के नौ दिवसीय कार्यक्रम के सातवें दिन कथावाचक राजन महाराज ने सीताराम- सीताराम- सीताराम भजन से श्रीराम कथा की शुरुआत की। ततपश्चात अयोध्या कांड से कथा का प्रारंभ हुआ। दर्पण में बैठे धूल जबतक साफ नहीं करेंगे तबतक अपना चेहरा साफ नहीं दिखता है, उसी प्रकार मन में बैठा मैल जबतक साफ नही होगा, भागवत कथा समझ में नहीं आएगा। सद्गुरु के कृपा से ही मन साफ होने वाला है।
राजन महाराज ने एक प्रसंग में बताया कि कौशल्या चाहती थी कि लक्ष्मण की जगह भरत को जंगल में साथ रखें। क्योंकि राम के बगैर भरत नहीं रह पाएगा।
श्रीराम के विवाह के 11 वर्ष तक उत्सव चला। उसके बाद घटना घटित हुआ और श्रीराम को वनवास जाना पड़ा। माँ कैकयी से बचपन में श्रीराम ने एक वचन लिया था। वहीं वचन को पूरा करने के लिए माँ कैकयी ने अपने आपको बलिदान दे दिया। कैकयी के ऊपर लांक्षन लगा।भरत ने खरी खोटी सुनाई। जग हंसाई हुई।
राम वन गए तो श्रीराम बन कर लौटे। सुरज जिधर निकल जाए उधर ही पूरब दिशा हो जाता है। अयोध्या में राम नहीं रहते हैं, अपितु राम जहाँ रहते है उसी को अयोध्या कहते हैं।
जिंदगी में न कोई दुख दे सकता है और नहीं कोई सुख दे सकता है। कर्म ही सुख और दुख का कारण बनता है। स्वप्न ने हमें दुखी किया है। कर्म करते रहिए, जो होना होगा होकर रहेगा।
क्या लेकर आया था जग में फिर क्या लेकर जाना है, मुट्ठी बांधे आया जग में हाथ पसारे जाना है। राजन महाराज ने भजन गाया तो श्रद्धालुओं झूम उठें।
अधिकार से मांगा जाता है उसे आदेश कहते हैं।
निवेदन कर मांगा जाता है अनुरोध कहते हैं। श्रीराम ने केवट से नाव से गंगा नदी पार कराने के लिए हाथ जोड़कर निवेदन किया।
करुणा निधान रउवा जगत के दाता हई, मति के फेर देनी, विपति के टेर देनी और भरत चले चित्रकूट हे रामा, राम को मनाने जैसे अनेकों भजन राजन महाराज ने गाया तो श्रद्धालुओं खुशी से खूब झूमें।
लोंग सामने वाला को खड़ा हुआ बर्दास्त नहीं करते, जबकि भगवान किसी को गिरा बर्दाश्त नहीं करते हैं
। होने के बाद भी मांग रहा है वह दारिद्रता है। दरिद्रता का संबंध अभाव से नहीं है बल्कि स्वभाव से है।
बेटे राम को वन जाने के वियोग में राजा दशरथ मरने के पहले 6 बार राम राम कहे। उसके बाद प्राण पखेडू उड़ गया ।
























