Home चंद्रपूर आधे में संतोष करने वाला ही बुद्धीमान, अगर बटवारा करना ही है...
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चंद्रपुर, (वि. प्र.) – नौ दिवसीय श्रीराम कथा के आठवें दिन बुधवार को आरती गान से कथा का प्रारंभ हुआ। ततपश्चात सीताराम का आह्वान किया गया। उसके बाद राजन महाराज ने भरत चले चित्रकूट हो रामा राम को मनाने, राम को मानने सिया लखन को मनाने, भजन गाया तो सभी श्रद्धालुओं गुनगुनाने लगे।
भरत अयोध्या से राम को मनाने चित्रकूट चल पड़े। उनके साथ अयोध्या वासी भी निकल पड़े। भरत ने तीर्थराज प्रयागराज से कहा कि मेरे कुल में मांगने की परंपरा नहीं है, देने की परंपरा है। फिर भी आज मै आपसे मांग रहा हूँ। मुझे न अर्थ चाहिए और न धर्म, न काम, न मोक्ष चाहिए। जब-जब मैं धरती पर जन्म लूं तब-तब मेरे भैया के चरणों में स्थान बना रहें।
जहाँ एक तरफ राम-राम लेते हुए भरत चित्रकूट की ओर बढ़ रहे थे तो दूसरी ओर चित्रकूट में श्री राम ने भरत-भरत नाम ले रहे थे।
कुर्सी पर बैठा आदमी सिर्फ अपनी कुर्सी के बारे में सोचता है। किसी के पास जरूरी बनकर न रहकर मजबूरी बनकर रहना चाहिए और यह समर्पण भाव से हो सकता है।
भरत जैसा भाई
भरत जी को चित्रकूट आने पर लक्ष्मण ने क्रोध में भरत को मारने के लिए दौड़ा तब श्रीराम ने लक्ष्मण को बताया कि इस धरती पर मेरे भरत जैसा कोई दूसरा भाई नहीं है। भाई-भाई एक दूसरे से मिले तो तीसरे को दीवार नहीं बनना चाहिए। चित्रकूट में भरत राम के पैर पर सष्टांग लेट गये। राम के प्रति भरत के प्रेम देखकर पत्थर पिघल गया।
श्रीराम और भरत प्रसंग को हल करने के लिए चित्रकूट में 5 बैठक हुए। भरत ने कहा था कि मैं जीवन भर वन में रहने के लिए तैयार हूं परन्तु भैया-भाभी अयोध्या लौट जाए। भैया-भाभी अयोध्या लौटने के लिए तैयार होते होंगे तो हम तीनों भाई भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न आजीवन वन में रहने के लिए तैयार है।
बुद्धिमान उसी को कहते है कि पूरा नही मिले तो आधा से संतोष कर लें। श्रीराम ने भरत से कहा कि आप अपना धर्म का पालन करो और मैं अपना धर्म का पालन करूँगा। हम दोनों बंटवारा कर लेते हैं। संपत्ति में नही विपत्ति में बटवारा करेंगे।
भरत को चित्रकूट से अयोध्या लौटने में 9 दिन लगा। आने के बाद चित्रकूट से लाये राम पादुका को राज सिंहासन पर रखें। जबकि स्वयं भरत अयोध्या से बाहर नन्दीग्राम में कुटिया में रहने लगे।
राजन महाराज ने अगर नाथ देखोगे अवगुण हमारे और रामा-रामा रटते-रटते बीती रे उमरिया,
मैं शबरी भिलनी के जाई, भजन भाव न जानू रे जैसे अनेकों भजन गायें, जिस पर श्रद्धालुओं खूब नृत्य किये। अधर्म पूर्वक जीवित रहने से अच्छा, धर्म पूर्वक मर जाना ज्यादा अच्छा है।
शबरी ने 10000 वर्ष तपस्या की थी। तब उसकी झोपड़ी में राम पहुंचें। श्रीराम ने शबरी को कहा कि मैं जाति पाती नहीं मानता हूँ। जिसके पास भक्ति है, वही मेरा अपना है।
नौ भक्ति
श्रवण (सुनना), कीर्तन (गाना), स्मरण (याद करना), पादसेवन (चरणों की सेवा करना), अर्चना (पूजा), वंदन (झुकना), दास्य (सेवक भावना), सख्य (दोस्ती)और आत्मनिवेदन (पूरा समर्पण); ये श्रीमद् भागवतम् और दूसरे ग्रंथों में बताए गए भगवान से जुड़ने के नौ रास्ते हैं।

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