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चंद्रपुर, (वि. प्र.) – नौ दिवसीय श्रीराम कथा के विश्राम सत्र गुरुवार को हनुमान चालीसा पाठ से प्रारंभ हुआ, उसके बाद यजमानों द्वारा आरती किया गया। ततपश्चात सीताराम- सीताराम का आह्वान किया गया।
जब अपना काम हो तो सामने वाला नहीं आये तो स्वयं उनके पास चले जाना चाहिए। श्रीराम भी वही किये। सुग्रीव नहीं आये तो श्रीराम ही उनके पास चले गये।
मित्र बनाकर छोड़ना नहीं चाहिए।अच्छा या बुरा है, मेरा सखा है। अपनी तरफ से संबंध बनाकर रखिए।
भगवान के नाम चुंबक जैसा है। उनके नाम के साथ जुड़ते ही काम होने लगता है।
सुंदर पर्वत से शुरू हुआ कथा इसलिए इस भाग का नाम सुंदरकांड रखा गया। जब इसे गाया जाता है तो उसे सुंदरकांड पाठ कहा जाता है। श्री हनुमान संमुद्र पार कर लंका गए, सीता को पता लगाए। लंका को जलाया पश्चात श्रीराम को सीता के संबंध में जानकारी दी।
बच्चे और बंदर के लिए मुंह सबसे सुरक्षित जगह है।
इसलिए बंदर और छोटे बच्चे बस्तुएं को मुंह में डाल लेते हैं। सौ काम छोड़कर भोजन करना चाहिए। 1000 काम छोड़कर स्नान करना चाहिए। एक लाख काम छोड़कर दान करना चाहिए। सब काम छोड़कर भजन करना चाहिए।
प्रसन्नता पूर्वक किया गया काम सफल होगा ही होगा।
साधु वही जो भजन करें, दूसरे से करवाए, जो न करें उससे भी भजन करवाए।
नील और नल दो बानर भाइयों को उसके उत्पात के कारण एक साधु ने श्राप दिया था कि वे दोनों भाई पानी में कुछ भी फेकेगा तो डूबेगा नहीं। भगवान कार्य के लिए श्राप ही वरदान बन गया। नील -नल दोनों भाई के सहयोग से राम सेतू बना।
श्रीराम सहित सेना लंका पहुंची। रावण मारा गया। सीता को लेकर राम अयोध्या पहुँचे। श्री राम जी का राज तिलक हुआ। इस अवसर पर सारे अयोध्या वासी नाच गा रहे थे।
कार्यक्रम के अंत में श्रीराम कथा के मुख्य सरंक्षक सुधिर मुनगंटीवार ने श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि राजन महाराज समय देते होंगे तो 2028 में 5 दिवसीय सुंदरकांड कथा का आयोजन अवश्य होगा। तबतक श्रीलखमापुर मंदिर का जीर्णोद्धार हो चुका रहेगा।
























