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जीव की मुक्ति अपने स्वयं के शुभ कर्मों से तथा हरि नाम से होती है. श्रीमद् भागवत कथा में मुरलीमनोहर व्यास का प्रतिपादन.!

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      चंद्रपूर,(वि. प्र.) : जो वस्तु तुम्हारे भाग्यमें नही है उसके पीछे मत भागो । अगर वह मिल भी गयी तो सुख होने के बजाय ़दु:ख ही होंगा। यह भागवतजी का सिद्धांत है।। पुत्र होने से ही सद्गति होती है, इस भ्रांती, अंधविश्वास को तोडती है, श्रीमद् भागवत कथा। मुक्ति, सद्गति पिंडदान आदि से नही अपितू अपने स्वयं के शुभ कर्मों से हरि भजन से ही होती है यह सिद्धांत है श्रीमद् भागवत कथा का। ऐसे विचार चंद्रपुर के आध्यात्मिक चिंतक साहित्यकार तथा भागवताचार्य मुरलीमनोहर व्यासजी ने प्रतिपादित किये!

श्री गोवर्धननाथजी हवेली चंद्रपुर के रजत जयंती के उपलक्ष्यमें में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के व्यासपीठ से श्री व्यासजी बोल रहे थे। दैनिक मनोरथी अधिवक्ता दिलीप राठी ने सपत्नी श्रीमद् भागवतजी का पूजन किया। पं नवल किशोर काकडा ने पूजन करवाया।

      व्यास ने श्रीमद् भागवत कथा में आत्मदेव ब्राह्मण की कथा विशद करते हुये उपरोक्त विधान करते हुये कहा महात्मा ने पहले ही उसे सावधान किया था, कि, तुझे संतान सुख नही है। तू भगवान की भक्ति कर जीवन सार्थक कर। लेकिन वह नही माने। परिणामत: उसके जीवन में धुंधकारी पुत्र आया। उनका जीवन दुखपूर्ण होगया।

व्यास ने कहा भागवत कथा ज्ञान देती है कि, प्राप्त में प्रसन्न रहने से ही सुख प्राप्त होता है।

 भागवतजी में लिखा है ,योग्य मुहूर्त में श्रीमद् भागवत कथा की स्थापना करें , और विद्द्वान निर्लोभी ब्राह्मण से कथा श्रवण करें। हर किसी ब्राह्मण से नही। ज्ञानी एवं गुरु कृपा बल प्राप्त ब्राह्मण से योग्य मुहर्त देखकर कथा श्रवण करें।

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