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Home चंद्रपूर श्रीमद् वल्लभाचार्यजी धर्माचार्य होने के साथ ही साहित्यकार और इतिहास संशोधक भी...

श्रीमद् वल्लभाचार्यजी धर्माचार्य होने के साथ ही साहित्यकार और इतिहास संशोधक भी थे। श्रीमद् वल्लभाचार्यजी जयंती में मुरलीमनोहर व्यासजी का प्रतिपादन।

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           चंद्रपूर,(वि. प्र.) : पुष्टिमार्ग के संस्थापक श्रीमद् वल्लभाचार्यजी का प्रागट्य ऐसे समय मे हुआ, जब भारत में लोधी साम्राज्य स्थापित हो चुका था और मुगलों का आगमन हो कर हिंदु धर्म के पालन में प्रतिबंध लग गये थे। पूजा पाठ करना , हिंदु धर्म के प्रतिक चिन्ह धारण करना अपराध माना जाता था।

        ऐसे समय में धर्म रसातल की ओर जा रहा था तब जगद्गुरु श्रीमद् वल्लभाचार्यजी का प्रागट्य वैशाख कृष्ण एकादशी संवंत 1535 के दिन छत्तीसगढ राज्य के चंपारण्य में हुआ। श्रीमद् वल्लभाचार्यजी ने श्रीकृष्ण भक्ति प्रतिपादित कर विपुल ग्रंथों का लेखन किया। उन्होंने ब्रजमंडल में स्थित श्रीकृष्ण लिला स्थानों का संशोधन किया , श्री गोवर्धननाथजी को प्रगट कर गोवर्धन पर्वत पर मंदीर बनवाकर सेवा पूजा प्रणाली निर्धारित की।श्री वल्लभाचार्यजी धर्माचार्य होने के साथ ही साहित्यकार और इतिहास संशोधक भी है। ऐसे विचार चंद्रपुर के आध्यात्मिक चिंतक तथा साहित्यकार मुरलीमनोहरजी व्यास ने प्रतिपादित किये।

   श्री गोवर्धननाथजी हवेली चंद्रपुर में सोमवार दि 13 अप्रैल को आयोजित श्रीमद् वल्लभाचार्यजी जयंती समारोह में व्यासजी बोल रहे थे। इस अवसरपर श्री गोवर्धननाथजी के सुखार्थ फुल मंडली बनाई गयी। दोपहर राजभोग दर्शनों में श्री गोवर्धननाथजी के तिलक दर्शन हुये। शयन दर्शन में श्री वल्लभाचार्यजी के तिलक दर्शन हुये। मुखीया विनोद भट्ट ने तिलक कर आरती उतारी। मदन शर्मा, मुरलीमनोहर व्यास, अनुराग त्रिवेदी और पिंगेजी ने वल्लभाचार्यजी के बधाई पदों का गायन किया।
व्यासजी ने कहा, हमारे परिवार में पिढीयों से जो आराधना हो रही होती है, उसे संपूर्ण श्रद्धा और विश्वास के साथ करते रहना चाहिए। उसी से कल्याण होता है।

     यह बात श्री वल्लभाचार्यजी के परिवार से सिखनी चाहिए। वैदिक तेलगु वेलनाडू ब्राह्मण यज्ञनारायण भट्ट की भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान ने कहा तुम्हारे परिवार में सौ सोमयाजी यज्ञ पुर्ण होने पर मै अंश रुप से पुत्र रुप में आऊंगा। लक्ष्मण भट्टजी ने सौ वां यज्ञ पूर्ण किया। और श्री वल्लभाचार्यजी का प्रागट्य हुआ।

  व्यासजी ने कहा, महापुरुषों का जीवन भी संघर्षों से भरा होता है। श्रीमद् वल्लभाचार्यजी जब दस वर्प के थे तभी उनके पिताश्री लक्ष्मण भट्टजी ब्रह्मलिन हो गये। माता की आज्ञा लेकर भारत परिक्रमा की। जगह जगह शास्त्रार्थों में भाग लेकर शुद्धाव्दैत प्रतिपादित कर वैष्णव धर्म स्थापित किया।

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