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भगवान श्रीकृष्ण की आठ पटरानीयां अष्टधा प्रकृतियां है। श्री गोवर्धननाथजी हवेली चंद्रपुर की श्रीमद् भागवत कथा में मुरलीमनोहरजी व्यास का प्रतिपादन।

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   चंद्रपूर,(का. प्र.) : श्रीमद् भागवतजी संस्कृत व्याकरण का ग्रंथ है इस की गुढभाषा है। इसे समझना सर्वसामान्य के लिए थोडा कठीन है। भगवान श्रीकृष्ण की सोलह हजार एक सौ आठ पत्नीयों का गुढ रहस्य है। भगवान श्रीकृष्ण परब्रह्म परमेश्वर है। श्रीकृष्ण स्वयं प्रकृति है। उनकी आठ पटरानीयां अष्टधा प्रकृतियां है। भूमि , जल, अग्नि, वायु, आकाश,मन, बुध्दि तथा अहंकार और सोलह हजार एक सौ रानीयां वेदों की ऋचाएं है। वेद कहते है उस परेमेश्वर की अद्भुत सामर्थ्य को हम नही जानते। अत: भगवान श्रीकृष्ण की सामर्थ्य का ज्ञान प्राप्त करने के लिए वेद मंत्र स्त्री रुप धारण कर आये। उनका भौमासुर अर्थात शारिरिक सुखोपभोग ने अपहरण कर लिया । उन्हें भगवान श्रीकृष्ण ने मुक्त कर अपनी शरण में लिया।सर्वसामान्य दृष्टि से भी देखो तो भौमासुर दैत्य द्वारा अपहरण की गयी सोलह हजार एक सौ राजकुमारीयों को स्विकार कर उनका जीवन संवारना अलौकिक कार्य है। भगवान श्रीकृष्ण पर टीका करना आसान है, लेकिन ऐसे अलौकिक कार्य करना असंभव है। ऐसे विचार चंद्रपुर के आध्यात्मिक चिंतक साहित्यकार तथा भागवताचार्य मुरलीमनोहर व्यासजी ने प्रतिपादित किये।

   श्री गोवर्धननाथजी हवेली चंद्रपुर में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा ज्ञान यज्ञ पुष्टिमार्ग के धर्माचार्य गोस्वामी श्री द्रुमिलकुमारजी महोदयश्री की आज्ञा से संपन्न हुआ है।

   दैनिक यजमान भुपेन्द्र व्यास परिवार तथा सादराणी परिवार और मुख्यमनोरथी सौ निता रमेशमाई शाह परिवार ने भागवतजी का पूजन किया। पं पवन व्यास और पं नवल काकडा ने पूजन करवाया। संध्या समय श्रीकृष्ण रुक्मिणी विवाह समारोह संपन्न हुआ।

  कौशिक व्यास ने श्रीकृष्ण और सौ मेघा व्यास ने रुक्मिणी की भूमिका निभाई। पं पवन व्यास और संजय नासिरकर ने मंगलाष्टकों का गायन किया।

     व्यासजी ने कहा प्राचिन काल से हमारी संस्कृति में बेटीयों को अपना वर पसंद करने का अधिकार रहा है। देवी रुक्मिणी और उनके पिता विदर्भ नरेश राजा भिष्मक और माता ने श्रीकृष्ण को वर रुप में पसंद किया। लेकिन बडे भाई रुक्मी ने अपनी मर्जी से शिशुपाल से विवाह कराना चाहा। रुक्मिणी ने श्रीकृष्ण को आत्मनिवेदन का पत्र सुदेव ब्राह्मण के माध्यम से भेज कर शिशुपाल से बचाकर स्वयं को स्विकार करने का निवेदन किया।


   व्यासजी ने कहा जीवन में जब भी संकट आवे, अपने स्वजन विरोधी हो जावें तब अपने सद्गुरु या श्रेष्ठ ब्राह्मण की सलाह से भगवान श्रीकृष्ण की शरण जाकर आत्मनिवेदन कर शरणागति पत्करना ही श्रेयस्कर रहता है।

          व्यासजी ने भगवान श्रीकृष्ण के समस्त विवाहों के प्रसंगों का वर्णन कर श्रोताओं को भावविभोर कर दिया। बडी संख्या में श्रोता भक्तों की उपस्थिती रही।

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