*मराठी स्कूल बचाने के लिए कानून बनाने की जरूरत*

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कामताकुमार सिंह/दुर्गापुर सवांददाता- सरकारी और अनुदानित संस्था के अर्द्ध सरकारी सेमी इंग्लिश मराठी विद्यालयों में विद्यार्थियों की संख्या की लिहाज से बेहद ही चिंताजनक स्थिति है। विद्यालय के भवन विशाल है। कई दर्जनों वाला रूम वाला विद्यालय की आज हालत यह है कि बच्चों के कमी के कारण विद्यालय महज कुछ रूम में चल रहा है। बाकी के दर्जनों रूम में सालों से ताला बंद है। यह स्थिति जिले भर के लगभग सभी सरकारी गैर सरकारी अनुदानित स्कूलों की है। ===================================   गाँव व शहरों के नजदीक के सरकारी और गैर सरकारी अनुदानित स्कूलों में बच्चों की संख्या दिन प्रतिदिन कम होती जा रही है, जबकि दूर दराज 10-15 किलोमीटर दूर इंग्लिश मीडियम के प्राइवेट स्कूलों में बच्चे इतने ज्यादा है कि कई सेक्सन क्लास चलाये जा रहे हैं। ===============================        सरकार व संस्था अनुदानित स्कूलों के शिक्षकों बेहद शालीन, कई प्रकार के डिग्रियों प्राप्त रहते हैं। उनके पढ़ाने के मामले में किसी प्रकार की कमी नही है। सिर्फ दिक्कत यह है कि इनके स्कूलों में मराठी इंग्लिश पढ़ाई होती है, जो आज के अभिभावकों को यह पसंद नहीं है। =============================            कान्वेंट स्कूलों का प्रचलन ==============================              क्या अमीर क्या गरीब, नेता हो अभिनेता, कलेक्टर हो या चपरासी, सेठ साहूकार हो या कर्जदारों, दुकानदार हो या खरीददार, बड़े किसान हो या छोटे किसान, ठेकेदार हो या मजदूर के सभी चाहते है कि मेरे बच्चे इंग्लिश मीडियम के कान्वेंट में पढ़े। घर की माली स्थिति कुछ भी हो बच्चे कान्वेंट में ही पढ़ेंगे। पिता अपनी स्थिति अनुकूल अपने बच्चे को सरकारी स्कूल में नाम लिखवाना चाहें भी तो बच्चे की मां हरगिज ऐसे होने नहीं देंगी। ऐसी स्थिति में सरकारी मराठी स्कूलों में अच्छे शिक्षकों को रहते हुए भी उनके स्कूलों में बच्चों साल दर साल कम होते जा रहे हैं। ==============================           मुफ्त शिक्षा, लंच फ्री =============================            मराठी स्कूलों के भवनों व अन्यों जरूरत के समान उपलब्ध है। कमी है तो बच्चों की। ऊंच शिक्षण प्राप्त शिक्षक तो है, भवन भी अच्छा है, परिसर ठीक ठाक है, स्कूल में कंप्यूटर है सहित अन्य उपकरण है। किताब मुफ्त में उपलब्ध है। दोपहर का खाना मुफ्त में मिलता है। फीस कुछ भी नहीं लगता है, फिर भी बच्चे कम है। =============================          सरकारी पेमेंट वाले सरकारी में ही पढ़े ============================             सरकारी पेमेंट लेने वाले के बच्चे सरकारी स्कूल में पढ़ाने के कानून बनाये जाए। कलेक्टर हो या चपरासी उनके बच्चे सरकारी स्कूल में ही पढ़नी चाहिए। यह तर्क कि सरकारी स्कूलों में सुविधा नहीं, यह बिल्कुल गलत है। थोड़ी कमी होगी तो सरकारी अधिकारियों के बच्चों को स्कूल जाने से वह आसानी से दूर किया जा सकेगा। आज से 30- 35 साल पहले सरकारी स्कूल ही हुआ करते थे। कलेक्टर, एस पी, वैज्ञानिक, नेताओं सभी सरकारी स्कूल से ही पढ़े हुए हुआ करते थे। तब के बजाय आज सरकारी स्कूलों में ज्यादा सुविधाएं उपलब्ध है। आज के शिक्षकों बीएड और एमएड किये हुए हैं।     =============================         सरकारी स्कूल वालों के ही सरकारी नौकरी =============================               सेमी इंग्लिश वाले बच्चों को ही सरकारी नोकरी दी जाएगी, ऐसा एक कानून बन जाये तो पहले जैसा ही सेमी इंग्लिश के मराठी स्कूलों में बच्चे प्रवेश लेना शुरू कर देंगे। ऐसा क्या कारण है कि पेमेंट ले सरकार से और अपने बच्चों को पढाये निजी स्कूल में, खास कर उन सरकारी अधिकारी और कर्मचारी के बच्चे का पढ़ाई सरकारी स्कूल में ही हो जिनके अभिभावक शिक्षा क्षेत्र में कार्यरत है। ============================                   पैसे का खेल,   ======================≠=====          सरकारी पेमेंट बढ़ने से उन कर्मचारी अधिकारियों की खर्च करने की क्षमता बढ़ी है। यही कारण है कि अपने बच्चों के पढ़ाई के ऊपर हजारों लाखों रुपये खर्च करने के लिए तत्पर रहते हैं।=============================            *”हँलो चांदा न्यूज “, करिता जिल्हा प्रतिनिधी, राजूरा गढ़ चांदूर तालुका प्रतिनिधींची नियुक्ती करणे आहे. इच्छुक प्रतिनिधीने संपर्क साधावा.* ==============================

संपादक :- शशि ठक्कर , 9881277793,9022199356
उपसंपादक:- विनोद शर्मा , वरोरा। 9422168069,

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