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चंद्रपूर,(वि.प्र.) : श्रीमद् भागवत ग्रंथ में नंद यशोदा का भावार्थ दिया है, जो अपने सभी सहयोगीयों को यश प्रदान करे वह यशोदा और सभी को अपने कार्यों से आनंद प्रदान करे वह नंद है। ऐसे लोगों के घर ही परमानंद प्रगट होता है।
नंद- यशोदा के घर परमानंद स्वरुप भगवान श्रीकृष्ण का प्रागट्य हुआ। सारे ब्रजवासीयों को आनंद हुआ जैसे अपने ही घर बालक हुआ हो। सभी नाचते गाते नंदबाबा के घर आनंद का नंदमहोत्सव मनाने पहूंच गये। जब भी हम मंदिरों में और भागवत कथा में नंदमहोत्सव मनाते है तब अद्भूत आनंद आता है, तो कल्पना किजिए जब प्रत्यक्ष भगवान श्रीकृष्ण प्रगट हुये थे तब कितना स्वर्णिम आनंद हुआ होंगाl ऐसे विचार चंद्रपुर के आध्यात्मिक चिंतक तथा साहित्यकार मुरलीमनोहर व्यास ने प्रतिपादित किये।
श्री गोवर्धननाथजी हवेली चंद्रपुर में श्री पुरुषोत्तम मास प्रित्यर्थ नंदमहोत्सव का आयोजन 10 जून को किया गया।
नंद भवन का सुंदर दृश्य रिना भट्ट ने तैयार किया। विजय भट्ट ने बाल कृष्ण के हाथों दही हंडी फुडवाई और आरती उतारी।
नंद घर आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की। धुन से मंदिर गुंजायमान हो गया। महिलाओं ने रास गरबा किया।
व्यासजी ने कहा श्रीकृष्ण के अनेक रुप है। बालकृष्ण जब-तक वृंदावन में रहे तब-तक परब्रह्म स्वरुप है। यह स्वरुप सेवनीय है।
बाद में भगवान श्रीकृष्ण राजाधिराज, राजयोगी, ज्ञानयोगी, ध्यानयोगी, मथुराधिपति, द्वारकाधिश आदि विविध स्वरुपों से पूजनीय बने।
बालकृष्ण की सेवा भक्ति वात्सल्य भाव तथा सख्य भाव से कर सकते है, लेकिन अन्य सभी स्वरुपों में मर्यादा पालन करनी पडती है।
इसीलिए पुष्टि संप्रदाय समेंत सभी वैष्णव संप्रदायाचार्य बालकृष्ण की सेवा पूजा करने का ज्ञान देते हैं।
























